परिचय
सदियों से भारतीय सभ्यता में विवाह के अवसर पर वधु-पक्ष द्वारा वर-पक्ष को धन, आभूषण, वाहन तथा अन्य वस्तुएँ उपहार स्वरूप देने की परंपरा चली आ रही है। मूल रूप से यह व्यवस्था इसलिए विकसित हुई थी ताकि नवविवाहित वधु का नए घर में सम्मान स्थापित हो सके और दांपत्य जीवन की शुरुआत एक सुरक्षित आर्थिक आधार के साथ हो। परंतु समय के साथ-साथ यह परंपरा अपने मूल उद्देश्य से भटक गई और आज दहेज़ प्रथा के रूप में एक विकृत सामाजिक समस्या बन चुकी है।
आधुनिक युग में, जहाँ महिला सशक्तिकरण ने समाज के हर क्षेत्र में अपनी स्पष्ट पहचान बनाई है और महिलाएँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं, वहाँ दहेज़ प्रथा न केवल अप्रासंगिक सिद्ध हो रही है, बल्कि सामाजिक, मानसिक और मानवीय दृष्टि से अत्यंत हानिकारक भी बन चुकी है। विवाह जैसे पवित्र संस्कार को जब लेन-देन और सौदेबाज़ी का रूप दे दिया जाता है, तब यह पूरे समाज की नैतिक संरचना पर प्रश्नचिह्न लगा देता है।
जब विवाह सम्मान नहीं, सौदेबाज़ी बन जाए
आज के सामाजिक परिदृश्य में वर-पक्ष द्वारा वधु-पक्ष पर दहेज़ का दबाव बनाना आम बात हो गई है। समाज में तथाकथित प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए धन और संपत्ति को विवाह की शर्त बना दिया गया है। प्रतिदिन ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर देते हैं।
जब विवाह जैसे भावनात्मक और आत्मिक रिश्ते को सुनार की तराज़ू पर तौला जाने लगे, तब यह किसी भी रूप में शुभ संकेत नहीं हो सकता। नवविवाहित जोड़ा, जो अभी एक-दूसरे की सोच, आदतों और जीवन-दृष्टि को समझने की शुरुआती अवस्था में होता है, दहेज़ का मुद्दा उनके बीच अविश्वास और तनाव की गहरी खाई पैदा कर देता है। यही कारण है कि अनेक विवाह संबंध दहेज़ की वजह से आरंभ होने से पहले ही विषाक्त हो जाते हैं।
युवाओं की सोच और दहेज़ की मानसिक गुलामी
युवाओं के भीतर शिक्षा, आत्मनिर्भरता और करियर निर्माण की जो प्रेरणा होनी चाहिए, जब वही “तगड़ा दहेज़” प्राप्त करने की मानसिकता में बदल जाती है, तो जीवन से शांति और संतोष का समाप्त हो जाना स्वाभाविक है। दूसरों के धन पर निर्भर होकर जीवन शुरू करने की सोच आत्म-सम्मान को धीरे-धीरे खोखला कर देती है।
यहीं पर डेरा सच्चा सौदा और राम रहीम का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। राम रहीम ने बार-बार समाज को यह समझाया है कि आत्म-सम्मान, मानवता और आध्यात्मिक मूल्य किसी भी विवाह संबंध से कहीं ऊपर हैं। यदि युवा ठान लें, तो वे अपनी मेहनत, क्षमता और संकल्प से न केवल अपना भविष्य संवार सकते हैं, बल्कि दहेज़ जैसी मानसिक जंजीरों से भी स्वयं को मुक्त कर सकते हैं।
दहेज़ प्रथा और लैंगिक असमानता की गहरी जड़ें

आज समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता की जड़ में दहेज़ प्रथा एक पुरानी और विषैली परंपरा की तरह बैठी दिखाई देती है। जैसे ही किसी घर में बेटी जन्म लेती है, उसी क्षण से उसके दहेज़ का हिसाब-किताब शुरू हो जाता है। यह अदृश्य बोझ उसके पूरे जीवन पर छाया रहता है।
बेटी को “पराया धन” समझकर उसकी शिक्षा और विकास में पर्याप्त निवेश नहीं किया जाता। परिणामस्वरूप उसका जीवन सीमित अवसरों और संकुचित संभावनाओं में उलझ कर रह जाता है। इस एक कुप्रथा ने माता-पिता और बेटी के बीच के भावनात्मक रिश्ते को भी कमजोर किया है, जहाँ प्रेम के साथ चिंता और भय भी जुड़ जाता है।
विवाह के बाद भी समाप्त नहीं होती दहेज़ की यातना
स्थिति तब और भयावह हो जाती है जब विवाह के बाद भी दहेज़ को लेकर तुलना और ताने समाप्त नहीं होते। गाँवों और कस्बों में यह चर्चा का विषय बन जाता है कि किस बहू ने कितना सामान, कितने गहने और कैसी सुविधाएँ लेकर आई।
अनेक मामलों में सास-बहू के रिश्ते इसी तुलना की आग में जलते हैं। दहेज़ की अपेक्षाएँ पूरी न होने पर शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना, घरेलू हिंसा और यहाँ तक कि हत्या जैसे अमानवीय अपराध सामने आते हैं। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि दहेज़ प्रथा के इतिहास पर खून के गहरे धब्बे अंकित हैं।
कन्या भ्रूण हत्या: दहेज़ का सबसे क्रूर परिणाम
जब एक पिता समाज में ऐसी घटनाएँ बार-बार देखता है, तो उसका मन भय और असुरक्षा से भर जाता है। स्वस्थ संतान की कामना “स्वस्थ पुत्र” की दुआ में बदल जाती है। परिणामस्वरूप कन्या भ्रूण हत्या जैसी अमानवीय प्रवृत्तियाँ जन्म लेती हैं।
राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों में यह समस्या एक समय भयावह स्तर तक पहुँच चुकी थी। 2011 की जनगणना के अनुसार हरियाणा में लिंग अनुपात 1000 पुरुषों पर मात्र 879 महिलाओं तक गिर चुका था। यह आँकड़े इस बात के प्रमाण हैं कि दहेज़ प्रथा केवल सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि एक जनसंख्या संकट भी है।
डेरा सच्चा सौदा: दहेज़ प्रथा के खिलाफ एक संगठित आंदोलन
जहाँ समस्या होती है, वहीं समाधान भी जन्म लेता है। डेरा सच्चा सौदा, जो हरियाणा के सिरसा में स्थापित है, वर्षों से समाज सुधार की दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। वर्तमान समय में यह संस्था बाबा राम रहीम के मार्गदर्शन और सिद्धांतों के अनुसार संचालित हो रही है।
संस्था के अनुयायियों की संख्या सात करोड़ से अधिक बताई जाती है। 1948 से लेकर आज तक डेरा सच्चा सौदा ने नशा मुक्ति, महिला सशक्तिकरण और नैतिक उत्थान जैसे विषयों पर ज़मीनी स्तर पर प्रभावी कार्य किया है। दहेज़ प्रथा के खिलाफ संघर्ष भी इसी सामाजिक सुधार यात्रा का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है।
बाबा राम रहीम का स्पष्ट संदेश: न देना है, न लेना है

राम रहीम ने दहेज़ जैसी कुरीतियों के प्रति हमेशा स्पष्ट और कठोर रुख अपनाया है। उनका संदेश सीधा है—दहेज़ न देना है और न लेना है। वे मानते हैं कि जिस परंपरा का उद्देश्य बेटी को ससम्मान विदा करना था, उसे धन वसूली का माध्यम बनाना न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि नैतिक पतन का प्रतीक भी है।
उनके अनुसार दहेज़ लेना व्यक्ति के भीतर छिपी क्रूरता और स्वार्थ का प्रमाण है, जो समाज को भीतर से खोखला कर देता है।
सादगी से विवाह: दिखावे के खिलाफ एक वैकल्पिक सोच
डेरा सच्चा सौदा में विवाह सादगी से विवाह के सिद्धांत पर आधारित होते हैं। यहाँ न दहेज़ का स्थान है, न दिखावे और फिजूलखर्ची का। महँगे पंडाल, अनावश्यक रस्में और आर्थिक बोझ से भरे आयोजन यहाँ हतोत्साहित किए जाते हैं।
डेरा का मानना है कि जब व्यक्ति राम-नाम से जुड़ता है, तो उसके भीतर स्वतः सादगी और संवेदनशीलता जाग्रत होती है। यही कारण है कि यहाँ के अनुयायी दहेज़-मुक्त और सरल विवाह को आत्मिक उन्नति का हिस्सा मानते हैं।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सहारा
जो परिवार आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, उनके लिए डेरा सच्चा सौदा स्वयं विवाह की पूरी जिम्मेदारी उठाता है। हर महीने हजारों शादियाँ सिरसा में अत्यंत सादगी और दहेज़-मुक्त वातावरण में संपन्न होती हैं।
यह केवल विवाह नहीं, बल्कि समाज को यह दिखाने का एक जीवंत उदाहरण है कि बिना दिखावे और लेन-देन के भी वैवाहिक जीवन की शुरुआत सम्मान और खुशी के साथ की जा सकती है।
प्रश्न 1: दहेज़ प्रथा की मूल परंपरा का उद्देश्य क्या था?
उत्तर: नवविवाहित वधु को नए घर में सम्मान और आर्थिक सुरक्षा देना।
प्रश्न 2: समय के साथ दहेज़ प्रथा एक सामाजिक समस्या कैसे बनी?
उत्तर: यह सम्मान की परंपरा से भटककर धन वसूली और सौदेबाज़ी का माध्यम बन गई।
प्रश्न 3: आधुनिक युग में दहेज़ प्रथा क्यों अप्रासंगिक मानी जाती है?
उत्तर: क्योंकि महिलाएँ आत्मनिर्भर और सशक्त होकर पुरुषों के समान आगे बढ़ रही हैं।
प्रश्न 4: दहेज़ का दबाव विवाह संबंधों पर क्या प्रभाव डालता है?
उत्तर: यह अविश्वास, तनाव और मानसिक दूरी पैदा करता है।
प्रश्न 5: युवाओं में दहेज़ की मानसिकता का क्या परिणाम होता है?
उत्तर: आत्म-सम्मान कमजोर होता है और जीवन से शांति समाप्त हो जाती है।
प्रश्न 6: दहेज़ प्रथा का लैंगिक असमानता से क्या संबंध है?
उत्तर: यह बेटियों को बोझ मानने की सोच को बढ़ावा देती है।
प्रश्न 7: विवाह के बाद दहेज़ को लेकर क्या समस्याएँ सामने आती हैं?
उत्तर: ताने, मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना और घरेलू हिंसा।
प्रश्न 8: दहेज़ प्रथा का सबसे क्रूर सामाजिक परिणाम क्या है?
उत्तर: कन्या भ्रूण हत्या और गिरता हुआ लिंग अनुपात।
प्रश्न 9: डेरा सच्चा सौदा दहेज़ प्रथा के खिलाफ क्या कार्य कर रहा है?
उत्तर: दहेज़-मुक्त और सादगीपूर्ण विवाह को बढ़ावा दे रहा है।
प्रश्न 10: बाबा राम रहीम का दहेज़ को लेकर क्या स्पष्ट संदेश है?
उत्तर: दहेज़ न देना है और न लेना है।
निष्कर्ष: दहेज़ के विरुद्ध संघर्ष एक श्रद्धांजलि
उम्मीद की जा सकती है कि दहेज़ प्रथा के खिलाफ यह आंदोलन निरंतर आगे बढ़ता रहेगा। जो अनगिनत महिलाएँ इस कुरीति की शिकार बनीं, उनके लिए यह प्रयास एक जीवंत श्रद्धांजलि के रूप में इतिहास में दर्ज होगा।
जब समाज बाबा राम रहीम, डेरा सच्चा सौदा, और सादगी से विवाह जैसे विचारों को आत्मसात करेगा, तभी दहेज़ प्रथा के खिलाफ यह लड़ाई वास्तव में सफल होगी।
